छठी अनुसूची के लिए घीसिंग प्रयासरत
सिलीगुड़ी : गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा सुप्रीमो सुभाष घीसिंग दिल्ली में कैंप कर दार्जिलिंग गोरखा हिल्स को छठी अनुसूची में शामिल कराने के लिए लगातार कोशिश में है। इसके लिए वे केंद्रीय मंत्रियों और कांग्रेस नेतृत्व को वर्ष 2005 के उस समझौता को याद दिलाने में लगे है जिसमें दागोपाप को छठी अनुसूची में शामिल करने को हस्ताक्षर किया गया था। इसके लिए राज्य सरकार की ओर से विधानसभा में विधिवत सर्वदलीय प्रस्ताव पारित कराकर केंद्र के पास भेजा था। वे केंद्र से पूछना चाहते ह है कि समझौता के समय केंद्र में यूपीए सरकार थी आज भी यूपीए की ही सरकार है फिर इसे लागू करने में परेशानी क्यों? श्री घीसिंग अंतरिम सेटअप के लिए 17 अगस्त को प्रशासनिक स्तर पर होने वाले त्रिपक्षीय वार्ता के पूर्व सरकार को बताना चाहते हैं कि छठी अनुसूची हिल्स में लागू करना क्यों जरुरी है।दागोपाप के बदले उसे और अधिकार, नाम में परिवर्तन और सीमांकन में भी फेर बदल किया जाएगा तो इसे गोजमुमो को छोड़ अन्य दल मानने वाला नहीं। गोरामुमो का दावा है कि अब तक दागोपाप को छठी अनुसूची में पारित करने के प्रस्ताव को खारिज नहीं किया गया है। गोरामुमो के आंदोलन में हिल्स को छठी अनुसूची में शामिल कराने के लिए राज्य सरकार ने दागोपाप को पूर्व से ज्यादा और 18 मौजा देकर इसे शामिल कर दिया गया था। छठी अनुसूची का विरोध करते हुए घीसिंग के करीबी विमल गुरुंग ने अलग पार्टी गोरखाजनमुक्ति मोर्चा का निर्माण किया और अलग राज्य की मांग पर आंदोलन प्रारंभ कर दिया। सुभाष घीसिंग ने विमल गुरुंग द्वारा गोरखालैंड नाम पर आंदोलन का विरोध किया था। घीसिंग का कहना है कि यह नाम सन 1980 में गोरखाओं को सम्मान दिलाने के लिए गोरामुमो ने रखा था। इस आदोलन में सैकड़ों गोरखाओं ने अपनी जानें गंवा दी थी। गोरामुमो समर्थन आज भी इसको ले मरने और जीने का जज्बा रखते है। पूर्व पार्षद टीकाराम क्षेत्री इसका ज्वलंत उदाहरण है। गोजमुमो समर्थकों के आगे समर्पण नहीं करने वाले गोरामुमो के ढाई सौ समर्थकों को हिल्स से खदेड़ दिया गया इसमें स्वयं घीसिंग, कार्सियांग की विधायक शांता क्षेत्री सहित कई पूर्व पार्षद भी इसमें शामिल है।
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