गोरखालैंड एक "जायज़" मांग
दोस्तों ,मैं दीपक राई इस वेबसाइट के माध्यम से सभी हिन्दीभाषी पाठको को गोरखा समुदाय के गौरवमय इतिहास से परिचित कराना तथा एक "जायज़" मांग पृथक गोरखालैंड राज्य कि मांग का समर्थन करना चाहता हूँ । गोरखा समुदाय को नेपाली समुदाय के नाम से भी उद्बोधन किया जाता ही जिसपर मुझे सख्त ऐतराज़ हैं क्यूंकि मैं पूर्णतया विशुद्ध भारतीय हूँ जितना कि आप सभी । भारत संघ कि अवधारणा को मजबूत करने के विश्वास को जीवंत करके ही मैं यह शब्द आपके साथ बोल रहा हूँ , सन 1971 में जब सिक्किम के शासक ने भारत संघ में विलय कि पहल की तो उससे पूर्व ही भारत के विभिन्न कोने में गोरखा समुदाय का वजूद रहा हैं । आज भी हमे की की ईपक कह सकता हूँ की भारत की आवाम अभी तक गोरखा समाज को भारतीयता में समावेश नहीं कर पा रहा हैं आज भी हमें हमारे देश भारत में अपने अस्तित्व को लेकर पशोपश की स्थिति में रहना पड़ रहा है ऐसा क्यों ? समय समय पर देश में जब भी कोई विप्पत्ति आई उस समय क्या गोरखा समुदाय ने अपना योगदान नहीं दिया क्या? आज़ादी की लड़ाई में जितना योगदान अन्य समुदाय ने दिया उतना हमारे भी समुदाय के लोगो ने दिया। सुभाष चन्द्र बोस के "आज़ाद हिंद सेना" में गोरखाओ के बलिदान को भूला नहीं जा सकता है ।आखिर फिर भी क्यों हमे अपनी राष्ट्रीयता साबित करने की नौबत बार आन पड़ती है ? एक उदाहरण देता हूँ - सन 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने तो नेपाली भाषा को भारत की क्षेत्रीय भाषा मानने से ही इनकार कर दिया था वो तो भला हो ज्योति बासु का जिन्होंने उस समय मोरारजी देसाई की बात का जोरदार खंडन कर हमें मान दिलाया था। गोरखालैंड की मांग हम इसलिए नहीं कर रहे है कि वर्तमान में तेलंगाना राज्य को केंद्र ने सहमति दे दी बल्कि हमारी मांग तो 1943 से सतत जारी है , समय समय पर गोरखालैंड राज्य कि मांग पर अनेक आन्दोलन हुए जिसमे सबसे चर्चित और हिंसात्मक आन्दोलन मई 1986 में सुभाष घिसिंग कि अगुवाई में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने की। 21 माह चले हिंसात्मक आन्दोलन में सरकारी आंकड़ो के हिसाब से 1200 लोग मारे गए। हिंसा का यह आन्दोलन गलत था इसमें कोई शक नहीं है परन्तु जिस तरह से वाम सरकार ने दमनपूर्ण कार्यवाही कि थी उसका भी जवाब ढूँढने की आवश्यकता थी।
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